हिंदी भाषा की प्रमुख साहित्यकारा महादेवी वर्मा

photo courtesy : Femina

हिंदी भाषा की प्रमुख साहित्यकारा, कवयित्री स्व. महादेवी वर्मा। उनका परिचय हिन्दी कविता के छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभ सुमित्रानन्दन पंत, जयशंकर प्रसाद और सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ के साथ किया जाता है। आधुनिक हिन्दी कविता में महादेवी वर्मा एक महत्त्वपूर्ण शक्ति के रूप में उभरीं। महादेवी वर्मा ने खड़ी बोली हिन्दी को कोमलता और मधुरता से संसिक्त कर सहज मानवीय संवेदनाओं की अभिव्यक्ति का द्वार खोला, विरह को दीपशिखा का गौरव दिया, व्यष्टिमूलक मानवतावादी काव्य के चिंतन को प्रतिष्ठापित किया। महादेवी वर्मा के गीतों का नाद-सौंदर्य, पैनी उक्तियों की व्यंजना शैली अन्यत्र दुर्लभ है। वे हिन्दी के भक्त कवियों की रचनाओं और भगवान बुद्ध के चरित्र से अत्यन्त प्रभावित थी। उनके गीतों में प्रवाहित करुणा के अनन्त स्रोत को इसी कोण से समझा जा सकता है। वेदना और करुणा महादेवी वर्मा के गीतों की मुख्य प्रवृत्ति है। असीम दु:ख के भाव में से ही महादेवी वर्मा के गीतों का उदय और अन्त दोनों होता है। उन्होंने खड़ी बोली हिन्दी की कविता में उस कोमल शब्दावली का विकास किया जो अभी तक केवल बृजभाषा में ही संभव मानी जाती थी। इसके लिए उन्होंने अपने समय के अनुकूल संस्कृत और बांग्ला के कोमल शब्दों को चुनकर हिन्दी का जामा पहनाया।

महादेवी वर्मा जी का काव्य अनुभूतियों का काव्य है। उसमें देश, समाज या युग का चित्रांकन नहीं है, बल्कि उसमें कवयित्री की निजी अनुभूतियों की अभिव्यक्ति हुई है। उनकी अनुभूतियाँ प्रायः अज्ञात प्रिय के प्रति मौन समर्पण के रूप में हैं। उनका काव्य उनके जीवन काल में आने वाले विविध पड़ावों के समान है। उनमें प्रेम एक प्रमुख तत्त्व है जिस पर अलौकिकता का आवरण पड़ा हुआ है। इनमें प्रायः सहज मानवीय भावनाओं और आकर्षण के स्थूल संकेत नहीं दिए गए हैं, बल्कि प्रतीकों के द्वारा भावनाओं को व्यक्त किया गया है। महादेवी जी के काव्य में आत्मनिवेदन का स्वर प्रधान है। अपने हृदय की विविध अनुभूतियों को ही कवयित्री ने काव्य का विषय बनाया है। अज्ञात प्रियतम के प्रति विरह व्यथा का निवेदन, मिलन का संकल्प, रहस्यमयी संवेदनाएँ और प्रकृति का कोमलकान्त दृश्यांकन आपके गीतों के प्रधान विषय हैं। आध्यात्मिकता और दार्शनिकता के झीने अंचल से आवृत्त आपके मृदुल उदगार एक मोहक भाव जगत् की सृष्टि करते हैं। महादेवी जी के काव्य का प्रधान रस श्रृंगार है। यद्यपि श्रृंगार के संयोग तथा वियोग दोनो ही पक्षों को कवयित्री ने काव्य का विषय बनाया है, तथापि वियोग की अभिव्यक्ति ही अधिक तल्लीनता से हुई है। यह वियोग लौकिक धरातल पर स्थित होते हुए भी अपनी भव्यता से अलौकिकता के अम्बर का स्पर्श करता चलता है। वह कबीर की भाँति वियोगिनी आत्मा का प्रियतम परमात्मा के प्रति प्रेम निवेदन बनकर सहृदयों के हृदयों को भाव तरंगों में झुलाने लगता है।

महादेवी जी का समस्त काव्य वेदनामय है। यह वेदना लौकिक वेदना से भिन्न आध्यात्मिक जगत् की है, जो उसी के लिए सहज संवेद्य हो सकती है, जिनसे उस अनुभूति-क्षेत्र में प्रवेश किया हो। वैसे महादेवी इस वेदना को उस दु:ख की भी संज्ञा देती हैं, “जो सारे संसार को एक सूत्र में बाँधे रखने की क्षमता रखता है” किन्तु विश्व को एक सूत्र में बाँधने वाला दु:ख सामान्यतया लौकिक दु:ख ही होता है, जो भारतीय साहित्य की परम्परा में करुण रस का स्थायी भाव होता है। महादेवी ने इस दु:ख को नहीं अपनाया है। कहती तो हैं कि “मुझे दु:ख के दोनों ही रूप प्रिय हैं, एक वह, जो मनुष्य के संवेदनशील हृदय को सारे संसार से एक अविच्छिन्न बन्धनों में बाँध देता है और दूसरा वह जो काल और सीमा के बन्धन में पड़े हुए असीम चेतन का क्रन्दन है” किन्तु उनके काव्य में पहले प्रकार का नहीं, दूसरे प्रकार का ‘क्रन्दन’ ही अभिव्यक्त हुआ है। यह वेदना सामान्य लोक हृदय की वस्तु नहीं है। सम्भवत: इसीलिए रामचन्द्र शुक्ल ने उसकी सच्चाई में ही सन्देह व्यक्त करते हुए लिखा है, “इस वेदना को लेकर उन्होंने हृदय की ऐसी अनुभूतियाँ सामने रखीं, जो लोकोत्तर हैं। कहाँ तक वे वास्तविक अनुभूतियाँ हैं और कहाँ तक अनुभूतियों की रमणीय कल्पना, यह नहीं कहा जा सकता”।

अक्सर उन्हें मीरा के साथ जोड़ा जाता है, आधुनिक मीरा कहा जाता है। आधुनिक हिन्दी की सबसे सशक्त कवयित्रियों में से एक होने के कारण उन्हें आधुनिक मीरा के नाम से भी जाना जाता है। कवि निराला ने उन्हें “हिन्दी के विशाल मन्दिर की सरस्वती” भी कहा है। महादेवी ने स्वतंत्रता के पहले का भारत भी देखा और उसके बाद का भी। वे उन कवियों में से एक हैं जिन्होंने व्यापक समाज में काम करते हुए भारत के भीतर विद्यमान हाहाकार, रुदन को देखा, परखा और करुण होकर अन्धकार को दूर करने वाली दृष्टि देने की कोशिश की। न केवल उनका काव्य बल्कि उनके सामाजसुधार के कार्य और महिलाओं के प्रति चेतना भावना भी इस दृष्टि से प्रभावित रहे। उन्होंने मन की पीड़ा को इतने स्नेह और शृंगार से सजाया कि दीपशिखा में वह जन-जन की पीड़ा के रूप में स्थापित हुई और उसने केवल पाठकों को ही नहीं समीक्षकों को भी गहराई तक प्रभावित किया। पर मीरा भक्तिकाल की मूल भावना भक्ति से जुड़ी हैं, उनके काव्य का संयोग, वियोग, प्रेम इसी भक्ति की छाप से रंगा हुआ है, तो महादेवी भारत में हो रहे बहुत सारे सामाजिक परिवर्तनों और व्यक्ति और समाज पर पड़ रहे इन परिवर्तनों के परिणामों की वाहक हैं। सामंती समाज और सामंती परिवार से मुक्ति और मानवीय गरिमा पर टिके समाज और संबंधों की एक अमूर्त प्रेरणा उनकी काव्य-संवेदना की नींवों में है। इसीलिए महादेवी प्रेम की कवयित्री हैं। उनकी कविता में प्रेम से भरा एक स्त्री-हृदय अपने होने का पता हर जगह देता है। उन्होंने दुख और पीड़ा को कविता का विषय बना लिया और इन विषयों पर आध्यात्मिक शब्दावली का आवरण चढ़ाकर कविताएं लिखीं-ऐसा नहीं था। परंतु महादेवी की कविताओं को इसी तरह समझा जाता रहा, क्योंकि समाज के मूल्य और उन पर टिकी स्थापित साहित्य-परंपरा उन्हें ऐसा समझना चाहती थी। सच तो यह है कि इन कविताओं के अनेक स्तर हैं। ये जटिल संरचना वाली कविताएं हैं। भारत में आधुनिकता के उदय और स्वतंत्रता के संघर्ष के विस्तृत हो कर एक समतापूर्ण समाज बनाने की मनोकांक्षा की पृष्ठभूमि इन कविताओं के पीछे है। इसलिए महादेवी वर्मा का जीवन और कविता दोनों ही एक नए जीवन की तलाश, उसके निर्माण और उसके संघर्ष की गवाही हैं।

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