~ रुपा वधावन
पहाड़ोंपर अक्सर मौसम और बारिश कुछ अनिश्चित सी होती है। बिजली की घड़घड़ाहट के साथ उमड़ते-घुमड़ते बादल और फिर अचानक बादलों से झांकती सूरज की किरणें। दूर पहाड़ों पर चांदी सी चमकती बर्फ़ की चादर।
बारिश के रुकने का इंतज़ार करती सफ़ेद बालोंवाली आंटी मुख पर चिर-परिचित मुस्कान फेंकती अक्सर दोपहर में होटल से बाहर निकलती हैं और नीचे की सड़कपर बाज़ार की तरफ़ जाती हैं। चाय की दुकानपर कप गिलास धोया हुआ मैं उनके निकलने का बेचैनी से इंतज़ार करता था। प्यारी सी मुस्कान फेंकती मुझे हाथ हिलाकर जाना, कहीं न कहीं मुझे अच्छा लगता था। आज कप टूट जाने पर दुकान के मालिक ने मुझे बहुत बुरे और कड़वे शब्द बोले, मजबूर था क्या करता।
मैं बहुत उदास था सिर नीचे झुकाकर बर्तन धोते धोते आंखों में भरे पानी को दबाने की कोशिश कर रहा था। अचानक किसी ने मेरे बालों में स्नेह भरा हाथ फेरा। मुंह उठाकर देखा तो आंटी खड़ी थीं – “मैने इस आदमी को तुम्हें डांटते हुए सुना था, तुम्हारी आंखों में अभी तक आंसू हैं। मैं बच्चों को दुःख में नहीं देख सकती।” हाथ पकड़कर मुझे होटल के रेस्तरां में ले गईं और उन्होंने मुझे पेस्टिरी और कोक पेप्सी दिया। मैं किसी अजनबी से कुछ लेना नहीं चाहता था परंतु आंटी के अपनेपन और स्नेह भरे आग्रह ने मुझे खाने को मजबूर कर दिया। “तुम बहुत छोटे हो, यह काम तुम्हें नहीं करना चाहिए। क्या कारण है, घर में कौन-कौन हैं?” प्रश्न अनेक पर मैं निरुत्तर। सुबह से भूखा था, पेट में कुछ गया तो कुछ समझने के लायक हुआ। आंटी के बार बार पूछनेपर चाबीवाले खिलौने की तरह लगातार बोलता रहा। मन में दबा दुःख, आंसू और शब्दों के रुप में फूट पड़ा। “घर में, मैं और मेरी मां हैं। जब बहुत छोटा था तो पिताजी चल बसे। मां ने चाय के बागान में काम करके गुज़ारा किया। नीचे चालान पर एक कच्चा पक्का मकान है। गरीबों के घर ऐसे ही होते हैं। आज कल मां बीमार है, बुखार आ रहा है। ज़्यादा छुट्टी हो गई इसलिए मालिक ने काम से बाहर कर दिया। अब मैं काम नहीं करुंगा तो मां की दवाई और खाना कहां से आएगा। आंटी की आंखों में पीड़ा देखी जा सकती थी। उन्होंने मेरी पीठ थपथपाई और मुस्कुराते हुए कहा, “कल मां को अपने साथ यहां लाना।” उनकी बात मेरी समझ से बाहर थी।
अगले दिन निकलते ही मैं होटल पहुंचने के लिए आतुर हो उठा । मां के सारे कपड़े लगभग फट गए थे। फिर भी एक साफ़ सलवार सूट पहनाकर मैंने मां को चलने को कहा। मां असमंजस में थी कभी बड़े लोगों से सामना नहीं हुआ था। आंटी बाहर लान में ही टहल रही थीं। हमें देखकर अपनेपन से मुस्कुराकर अपने रुम में ले गईं। बोलीं- “चिंता मत करो। कुछ दिन आराम करो, तुम्हारे लिए नौकरी पक्की है। रुम सर्विस का काम है, ईमानदारी और लगन से करना। कुछ समय बाद तुम्हें यहीं पर रहने को घर भी दिया जाएगा।”
मां और मैं एक दूसरे को ऐसे देख रहे थे जैसे कोई बिन मांगे मोती मिल जाए। मां ने केवल हां में उत्तर दिया। उनके पास कहने को कोई शब्द ही नहीं थे। आंटी फिर बोलीं इस बच्चे को स्कूल भेजो, इसकी उम्र काम करने की नहीं पढ़ने-लिखने और खेलने की है। एक लम्बी आह भरते हुए कहा, “किसी अबोध बच्चे का मजबूरी में बचपन ख़राब होते हुए मुझसे नहीं देखा जाता।” स्कूल न जाने का जो दुःख मेरे मन को कचोटता था। उनकी बातों ने मेरी आंखों में जुगनू सी चमक भर दी। मां को नौकरी और मुझे पढ़ने के लिए स्कूल। लगने लगा घाटी में ज़ोर ज़ोर से चिल्लाकर खुशी बयां करुं।
दो-तीन दिन में मां ठीक हो गई, होटल की यूनिफॉर्म में वह बहुत सुंदर लग रही थी। आंटी ने कहा था कि काम में अनुशासन और समय पाबंदी ज़रुरी होती है। एक आज्ञाकारी बच्चे की तरह मां ने सब माना। आज स्कूल जाने का पहला दिन था। मैं जैसे आवारा बादल बन गया था। न जाने क्या क्या सोच रहा था। मां ने आंटी को भगवान समझकर उनके पैरों में प्रणाम किया। लगभग एक सप्ताह बाद आंटी वापिस अपने घर दिल्ली जा रही थीं। गाड़ी में बैठे वह चिर-परिचित अंदाज़ में मुस्कान बिखेरते हुए हाथ हिला रही थीं। मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि मैं खुश हूं या उदास।
समय बीतता गया, मैं स्कूल चला जाता और मां होटल के काम में व्यस्त हो गई। मां की काम के प्रति ईमानदारी और मेहनत को देखते हुए, होटल के भागीदारों ने, जिसमें आंटी भी थीं, होटल में ही रहने के लिए घर दिया। अब हमारा जीवन स्तर ऊंचा हो गया था। पर मैं जब भी चाय की दुकान के सामने से निकलता तो एक आक्रोश और घुटन मन में महसूस करता। बचपन के अनुभव कभी फीके नहीं पड़ते। समय के साथ साथ वह टीसते हैं।
करीब एक साल बाद अचानक एक लम्बी सी गाड़ी होटल के गेट पर रुकी। गार्ड ने सलाम किया और अदब से कार का दरवाज़ा खोला। हल्के रंग की पोशाक में आंटी उतरीं। वह बहुत कमजोर और उदास नज़र आ रही थीं।
शाम को जब लान में वह टहल रही थीं तो बाहर निकलते हुए मेरी नज़र उनपर पड़ी। मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि उन्हें कैसे मिलूं और क्या बोलूं? अभी सोच ही रहा था कि उन्होंने इशारे से मुझे बुलाया, “अरे! तुम तो लम्बे और बड़े हो गए हो, क्या नाम है तुम्हारा?” “आदित्य…” मैंने सकुचाते हुए जवाब दिया। “अच्छी तरह पढ़ रहे हो, रोज़ स्कूल जाते हो? तुम्हें एक अच्छे और सफल बच्चे के रुप में देख रही हूं।” इतने में मां भी कमरे मे काम करके बाहर निकलते हुए हमारी तरफ़ आ गई। आंटी के पैरों में प्रणाम किया। बात करते हुए पता चला कि पांच महीने पहले उनके पति की कैंसर से जूझते हुए मौत हो गई थी। अब आंटी अकेली रहती थीं ।उनका इकलौता बेटा विदेश में अपने परिवार के साथ रह रहा था। शायद ही कभी अपने देश आया हो। आंटी का कोई अपना नहीं था। उन्होंने बताया कि शहर में ईमानदार लोगों की बहुत कमी है। हर एक दूसरे को लूटना खसोटना चाहता है। नेक और अच्छे लोग ढूंढने पर भी नहीं मिलते हैं।
मां ने रात को सोते समय बताया कि आंटी हम दोनों को दिल्ली अपने साथ लेकर जाना चाहती हैं। मां पूरी रात सो न सकी। हम पहाड़ी लोग शांत, सीधे साधे ढंग से अपनी जीविका चलाते हैं। शहर के वातावरण और चकाचौंध को मां ने कभी देखा नहीं था। उनको उदास देखकर मैं भी सहम गया। आंटी के सवाल पर मां ने अभी कोई फैसला नहीं लिया था।
सुबह मां का निर्णय सुनकर मैं हैरान हो गया। मां ने कहा, “जब हम मुसीबत से गुजर रहे थे तो एक अजनबी ने हमें सहारा दिया। हमें उनके अहसान को भूलना नहीं चाहिए। अगर वह हमें अपना मानकर साथ लेकर जाना चाहती हैं तो हमें इंकार नहीं करना चाहिए। वैसे हम दोनों के लिए जीवन का बहुत बड़ा निर्णय था।
हम दिल्ली में आंटी की तीन मंजिला कोठी के सामने उतरे। इतना बड़ा और भव्य घर हमने कभी सपने में भी नहीं देखा था। मैं छोटा था, शहर की चकाचौंध और आधुनिकता से ज़्यादा ही प्रभावित हो गया। मां की मनःस्थिति समझने की मुझमें बुद्धि नहीं थी। एक बड़े स्कूल में मेरा दाखिला करवा दिया गया। गांव के स्कूल से एक दम अलग वातावरण। तेजतर्रार बच्चे, आधुनिकता की छाप, भागम भाग। मैं स्कूल कई मील चलकर जाता था, अब कोठी के गेट पर स्कूल बस लेने भी आती है और छोड़ने भी।
मां हर काम अपने हाथ से करती थी और अब वही काम मशीनें और अनगिनत सुविधाएं। आंटी अब बहुत कमजोर और बूढ़ी हो गई थीं। मां ने घर की सारी देखभाल और ज़िम्मेदारी संभाल ली थी।
समय जैसे उड़ान भरने लगा था। मैं बड़ा हो गया था अब सारी बातें मेरी समझ में आने लगी थीं। मां की आंखों में गांव और अपनी पहचान छोड़ने का ग़म अब मैं देख और समझ सकता था। मेरी स्कूली शिक्षा पूरी हो चुकी थी। मेरा परिचय एक कुशाग्रबुद्धि विद्यार्थी और कामयाब लड़के के रूप में जाना जाता था। उच्च शिक्षा के लिए मैं बाहर चला गया। मां को उस दिन ख़ामोशी से सब सहते देखा। मेरे जीवन के लिए मां ने अपने मनोभावों को दबा दिया था। पीछे केवल आंटी और मैं अकेली रह गई थी, एक दूसरे के दुःख सुख की साथी।
मैं पढ़ने में तल्लीन हो गया। कभी कभी मां और आंटी का हालचाल फोन करके पूछ लेता था। पढ़ाई का आख़िरी साल था। जब भी फोन करता, ऐसा लगता मां कुछ छिपा रही है। आंटी से बात करने को कहता तो टाल जाती। कहती वह ठीक हैं, अभी आराम कर रही हैं। मैं कामयाबी की सीढ़ियां चढ़ता जा रहा था। यूनिवर्सिटी में टाप किया, बहुत खुश था। बचपन के सारे अभाव भुला कर आगे बढ़ रहा था।
सोचा आज ज़रुर आंटी से बात करुंगा और मुझे एक अच्छा और कामयाब इंसान बनाने के लिए सहदिल धन्यवाद्। फोन पर मां की आवाज भर्राती हुईं थी। रोकने पर भी मां फूट पड़ी – “बेटा तुम्हारी आंटी दुनिया में नहीं रहीं।” मेरी आंखों के आगे अंधेरा छा गया। आंखों में पानी तैरने लगा। सुबह की फ्लाइट से दिल्ली पहुंच गया। मां ने बताया कि आंटी मेरी पढ़ाई में विघ्न नहीं डालना चाहती थी उन्होंने मुझे कसम दिलवायी “अगर मैं दुनिया में न भी रहूं तो जब तक मेरे पेपर हैं कुछ नहीं बताओगी।”
सदा सुंदर मुस्कान फेंकती आंटी अब कभी हाथ हिलाती नज़र नही आएंगी। सोचता हूं इतनी बड़ी दुनिया में कोई इतना अच्छा कैसे हो सकता है? जैसी आंटी ने अपरिचित होते हुए भी एक मुरझाए फूल जैसे बच्चे को नवजीवन दिया। क्या यही ईश्वर का रुप है जिसे हमने कभी देखा नहीं।
मां अपने जीवन के कुछ पल अपने गांव पहाड़ों में बिताना चाहती थी। उनके त्याग ने मुझे नतमस्तक कर दिया।
