~ रुपा वधावन
बचपन में कभी किताबों में पढ़ा था, एक था बरगद का पेड़।
बड़े यत्न से उसे लगाया, स्नेह के जल से सींचा उसको…
दादाजी थे मजबूत जड़ें उसकी।
शाखाएं सदस्य थे उसके, नन्हीं कोपलें घर के बच्चे।
पक्षियों का कलरव था, चहचहाहट उनकी।
गरिमा लिए थे आपसी रिश्ते।
जब कोई समस्याग्रस्त हो जाता था,
पास दादाजी के चला आता था।
सचमुच दादाजी जादू का पिटारा थे,
अनुभवों की पाठशाला थे।
छत्रछाया में उनकी घर-आंगन खुशहाल था।
बरगद से प्रहरी थे घर के, शीतल पवन का झोंका थे…
विपरीत दिशा से आंधी का एक झोंका आया।
ग़लतफ़हमियों का बवंडर साथ में लाया।
तर्क-वितर्क की गरमा-गरमी में,
निज स्वार्थ की तपिश से घर आंगन रेगिस्तान बन गया।
अपना घर, अपना आंगन, अपने पौधे, अपने बच्चे।
बीचों बीच दीवार खींच गई, धूमिल मन, भ्रमित विश्वास
मानों सब हो गये आज़ाद…
जहां था खट्टा मीठा भोजन का स्वाद।
खिलखिलाहट सम्बन्धों की गूंजन करती थी,
वीरानी अब झलकती है।
दादाजी घर का पुराना सामान हो गए,
पुस्तकालय की धूल भरी किताब हो गए,
हर एक अपने में समझदार हो गया,
क्यों जाएं दादाजी के पास,
कर सकते हैं हम हर समस्या का निदान।
बहुमंज़िला इमारत के आगे
आज भी वह बरगद का पेड़ खड़ा है।
एक घर को शीतल छाया देता,
दूसरे घर में शाखाएं हैं उसकी ।
परिंदे अब भी आते हैं, डालियोंपर झूल-झूलकर ,
मधुर गीत सुना जाते हैं।
बंद हैं खिड़की दरवाजे,
बंद हो गई बच्चों की मुस्कुराहट।
हम कहां जा रहे हैं?
जीवनमूल्य, समर्पण, मधुरता रिश्तों की कहीं पीछे छोड़
आधुनिकता की होड़ लगाए, दिशाहीन बढ़ते जा रहे हैं।
‘वसुधैव कुटुंबकम्’ पढना भूल गए हैं,
जब सफलता की ऊंचाई पर चढ़ जाओगे,
नीचे की धरती वही पाओगे।
